डाकू रत्नाकर से आदिकवि वाल्मीकि तक की गाथा, यूपी में रामायण से जुड़े स्थलों पर करोड़ों का काम
चित्रकूट से अयोध्या और इटावा तक विरासत संवारने की तैयारी, घाटों से पर्यटन केंद्रों तक बदलेंगी सुविधाएं

रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि से जुड़ी विरासत को नई पहचान देने के लिए उत्तर प्रदेश में कई धार्मिक पर्यटन परियोजनाओं पर काम किया जा रहा है। चित्रकूट, अयोध्या और इटावा में आश्रमों, मंदिरों, घाटों और पर्यटक सुविधाओं के विकास पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। महर्षि वाल्मीकि जयंती 26 अक्टूबर के अवसर पर इन परियोजनाओं के जरिए उनकी साहित्यिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के प्रयास चर्चा में हैं। प्रदेश सरकार रामायण सर्किट और राम वन-गमन पथ के तहत इन स्थलों के संरक्षण और विकास पर जोर दे रही है।
चित्रकूट में आश्रम से घाट तक विकास
चित्रकूट के लालापुर स्थित वाल्मीकि आश्रम के विकास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। पर्यटन विभाग के अनुसार, वित्त वर्ष 2021-22 और 2023-24 के दौरान 19.95 लाख रुपये की लागत से यहां 12.5 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा स्थापित की गई। आश्रम के विकास पर 184.95 लाख रुपये खर्च किए गए हैं। इसके पास 1120.79 लाख रुपये की लागत से पर्यटन सुविधा केंद्र का निर्माण भी लगभग पूरा होने की जानकारी दी गई है।
वित्त वर्ष 2025-26 में लालापुर के प्राचीन हनुमान मंदिर के विकास के लिए 166.24 लाख रुपये, तमसा गंगा नदी पर वाल्मीकि घाट के निर्माण के लिए 905.08 लाख रुपये और आश्रम में परिक्रमा पथ व आरती स्थल के विकास के लिए 525.77 लाख रुपये की परियोजनाएं संचालित की जा रही हैं। इन कार्यों का उद्देश्य श्रद्धालुओं के आवागमन और धार्मिक गतिविधियों से जुड़ी सुविधाओं को बेहतर बनाना है।
अयोध्या और इटावा भी योजना में शामिल
वाल्मीकि विरासत से जुड़े दूसरे स्थलों पर भी विकास की योजना है। अयोध्या के दोस्तपुर स्थित महर्षि वाल्मीकि आश्रम के पर्यटन विकास के लिए 107.48 लाख रुपये का प्रावधान किया गया है। वहीं, इटावा के बेला गांव स्थित प्राचीन वाल्मीकि मंदिर के विकास के लिए 83.17 लाख रुपये निर्धारित किए गए हैं।
अयोध्या में महर्षि वाल्मीकि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और वाल्मीकि भवन, जिसे रामायण भवन भी कहा जाता है, उनकी विरासत से जुड़े प्रमुख नाम हैं। रामायण भवन की दीवारों पर संस्कृत में रामायण अंकित होने की जानकारी दी गई है।
रत्नाकर से महर्षि बनने की प्रेरक कथा
धार्मिक मान्यता के अनुसार, महर्षि वाल्मीकि का मूल नाम रत्नाकर था। कहा जाता है कि देवर्षि नारद से भेंट के बाद उनके जीवन में परिवर्तन आया और उन्होंने तपस्या का मार्ग अपनाया। लंबे समय तक साधना करने के दौरान उनके चारों ओर दीमकों का टीला बन गया। संस्कृत में ‘वाल्मीक’ का अर्थ दीमकों का टीला माना जाता है, इसी से उनका नाम वाल्मीकि पड़ा।
परंपरा के अनुसार, क्रौंच पक्षी के वध से उपजी करुणा उनके मुख से प्रथम श्लोक के रूप में निकली। बाद में उन्होंने रामायण की रचना की। रामकथा में माता सीता के वाल्मीकि आश्रम में लव-कुश को जन्म देने और महर्षि द्वारा दोनों को शिक्षा देने का भी वर्णन मिलता है।
विरासत को पर्यटन से जोड़ने की पहल
पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने महर्षि वाल्मीकि के जीवन को आत्मबोध, ज्ञान-साधना और सकारात्मक बदलाव की प्रेरणा बताया है। पर्यटन, संस्कृति एवं धर्मार्थ कार्य विभाग के अपर मुख्य सचिव अमृत अभिजात के अनुसार, इन स्थलों के विकास का उद्देश्य रामायण परंपरा से जुड़ी विरासत को व्यापक पहचान दिलाना और भावी पीढ़ियों को इससे परिचित कराना है।
चित्रकूट, अयोध्या और इटावा में चल रही परियोजनाओं से धार्मिक स्थलों पर सुविधाएं बढ़ाने और रामायण से जुड़ी सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण की योजना है।



