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क्यों मनाई जाती है अहोई अष्टमी? राधाकुंड में आधी रात को स्नान की क्या है मान्यता

संतान सुख और राधाकुंड की अनूठी परंपरा

लेखक: कपिल माखीजा, जनशक्ति उजालास्थान: मथुरा (गोवर्धन-राधाकुंड), उत्तर प्रदेश3 मिनट पढ़ें
श्रीकृष्ण और राधारानी की पौराणिक कथा से जुड़ा पवित्र राधाकुंड और श्यामकुंड ।
श्रीकृष्ण और राधारानी की पौराणिक कथा से जुड़ा पवित्र राधाकुंड और श्यामकुंड ।
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कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाने वाला अहोई अष्टमी का पर्व मातृत्व, संतान की खुशहाली और परिवार की मंगलकामना से जुड़ा है। इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में गोवर्धन के निकट स्थित राधाकुंड में इस पर्व का विशेष धार्मिक महत्व है। यहां अहोई अष्टमी की मध्यरात्रि में स्नान करने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु और संतान सुख की कामना करने वाले दंपती पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन राधाकुंड में स्नान और राधारानी की आराधना करने से संतान सुख का आशीर्वाद मिलता है।

अहोई माता के व्रत के पीछे की कथा

लोकप्रचलित कथा के अनुसार, एक साहूकार के सात बेटे और एक बेटी थी। दीपावली से पहले घर की लिपाई-पुताई के लिए साहूकार की पत्नी जंगल में मिट्टी खोदने गई। वहां अनजाने में उसकी खुरपी से स्याहू (साही) के एक बच्चे की मृत्यु हो गई। अपने बच्चे की मृत्यु से दुखी स्याहू ने साहूकार की पत्नी को श्राप दिया। इसके बाद उसके सातों बेटों पर संकट आया और उनकी मृत्यु हो गई।

संतान के वियोग से दुखी साहूकार परिवार की महिलाओं ने अहोई माता की आराधना और व्रत किया। मान्यता है कि उनकी श्रद्धा और प्रार्थना से प्रसन्न होकर माता ने संतान की रक्षा का आशीर्वाद दिया। तभी से अहोई अष्टमी पर माताएं संतान की सलामती और खुशहाली के लिए व्रत करती हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में इस कथा के प्रसंगों में कुछ अंतर भी मिलता है।

कैसे बना राधाकुंड और श्यामकुंड ?

राधाकुंड की परंपरा भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी की एक अन्य पौराणिक कथा से जुड़ी है। मान्यता है कि द्वापर युग में श्रीकृष्ण ने अरिष्टासुर नाम के असुर का वध किया था। अरिष्टासुर ने बैल का रूप धारण किया हुआ था। उसके वध के बाद राधारानी और गोपियों ने श्रीकृष्ण से कहा कि उन्होंने गोवंश के रूप में आए असुर का वध किया है, इसलिए उन्हें प्रायश्चित करना चाहिए।

कथा के अनुसार, श्रीकृष्ण ने अपनी एड़ी से धरती पर प्रहार किया, जिससे एक कुंड बना। उन्होंने सभी पवित्र तीर्थों का आह्वान किया और उनके जल से कुंड भर गया। इसे श्यामकुंड कहा गया। इसके बाद राधारानी ने अपनी सखियों के साथ अपने कंगनों से पास में ही दूसरा कुंड खोदा। सभी तीर्थों का जल उसमें भी समाहित हुआ और वह राधाकुंड कहलाया। दोनों कुंड आज भी एक-दूसरे के समीप स्थित हैं।

आधी रात के स्नान की क्या है मान्यता ?

ब्रज की धार्मिक परंपरा में कार्तिक कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस समय राधाकुंड में पति-पत्नी एक साथ स्नान कर राधारानी से संतान सुख की प्रार्थना करते हैं। स्नान के दौरान पेठा यानी कुष्मांड फल अर्पित करने की भी परंपरा है। जिन दंपतियों की मनोकामना पूरी हो जाती है, वे अगले वर्षों में राधाकुंड पहुंचकर राधारानी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।

1 नवंबर को राधाकुंड में विशेष स्नान

वर्ष 2026 में अहोई अष्टमी रविवार, 1 नवंबर को मनाई जा रही है। इस अवसर पर राधाकुंड और श्यामकुंड के घाटों पर मध्यरात्रि स्नान के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है। इस तरह अहोई अष्टमी एक ओर माताओं के संतान की मंगलकामना वाले व्रत का पर्व है, तो दूसरी ओर राधाकुंड में राधारानी के प्रति आस्था और विश्वास की अनूठी परंपरा का प्रतीक भी है।

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