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करवा चौथ पर चांद का इंतजार ही नहीं, रिश्तों के भरोसे का भी है खास महत्व

प्रेम, आस्था और परंपरा के संग मनाया जाने वाला यह पर्व बदलते समय में आपसी सम्मान और भावनात्मक जुड़ाव का संदेश भी देता है

लेखक: कपिल माखीजा, जनशक्ति उजालास्थान: नई दिल्ली4 मिनट पढ़ें
करवा चौथ पर चंद्र दर्शन के बाद व्रत खोलने की परंपरा। (प्रतीकात्मक चित्र)
करवा चौथ पर चंद्र दर्शन के बाद व्रत खोलने की परंपरा। (प्रतीकात्मक चित्र)
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करवा चौथ भारतीय परंपरा का ऐसा पर्व है, जिसमें धार्मिक आस्था के साथ दांपत्य जीवन की भावनाएं भी जुड़ी होती हैं। पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और वैवाहिक जीवन की खुशहाली की कामना के साथ विवाहित महिलाएं दिनभर व्रत रखती हैं। शाम को पूजा-अर्चना और करवा चौथ की कथा के बाद सभी को चंद्रमा के दर्शन का इंतजार रहता है। चांद निकलने पर पारंपरिक विधि से पूजा की जाती है और फिर व्रत खोला जाता है। इस वर्ष करवा चौथ गुरुवार, 29 अक्टूबर को मनाया जा रहा है। बदलते सामाजिक परिवेश में यह पर्व प्रेम, विश्वास, साझेदारी और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी की भावना से भी जुड़ गया है।

धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी है परंपरा

करवा चौथ विशेष रूप से उत्तर भारत में उत्साह के साथ मनाया जाता है। मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश सहित कई क्षेत्रों में इस पर्व की अलग-अलग परंपराएं प्रचलित हैं। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी पर भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और कार्तिकेय की पूजा की जाती है। कई स्थानों पर करवा माता की आराधना भी होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत पति की दीर्घायु और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से रखा जाता है।

सरगी से शुरू होती है दिनभर की तैयारी

करवा चौथ की शुरुआत सूर्योदय से पहले सरगी ग्रहण करने के साथ होती है। परंपरागत रूप से सास अपनी बहू को फल, मिठाइयां, सूखे मेवे और अन्य खाद्य पदार्थ देती है। इसके बाद महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं। सरगी को परिवार के स्नेह, आशीर्वाद और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। अलग-अलग परिवारों में सरगी से जुड़ी रस्मों में अंतर हो सकता है।

सोलह शृंगार और बाजारों में रौनक

इस पर्व पर पारंपरिक परिधान और सोलह शृंगार का विशेष आकर्षण रहता है। महिलाएं साड़ी या लहंगा पहनने के साथ मेहंदी, चूड़ियों, सिंदूर और आभूषणों से शृंगार करती हैं। लाल, गुलाबी और मैरून जैसे रंगों को खास पसंद किया जाता है। त्योहार के दौरान कपड़ों, आभूषणों, मेहंदी और सौंदर्य प्रसाधनों की दुकानों पर भी चहल-पहल बढ़ जाती है। पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ आधुनिक फैशन और सोशल मीडिया ने भी उत्सव के स्वरूप को नया आयाम दिया है।

कथा, पूजा और चंद्र दर्शन की रस्म

शाम को महिलाएं पूजा की सामग्री के साथ करवा चौथ की कथा सुनती हैं। प्रचलित कथाओं में वीरावती की कहानी का विशेष उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार, वीरावती ने पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखा था, लेकिन भूख-प्यास से व्याकुल होने पर उसके भाइयों ने छल से चंद्रोदय होने का आभास करा दिया। व्रत खोलने के बाद उसके पति पर संकट आया। इसके बाद वीरावती ने दोबारा श्रद्धा से पूजा की। इस कथा को व्रत की निष्ठा और आस्था के संदेश से जोड़ा जाता है।

दिनभर के उपवास के बाद चंद्रमा के दर्शन इस पर्व का सबसे प्रतीक्षित क्षण होता है। परंपरा के अनुसार, महिलाएं छलनी से चंद्रमा और फिर पति का चेहरा देखती हैं। चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद पति के हाथों जल ग्रहण कर व्रत खोला जाता है। कई परिवारों में इस अवसर पर मिठाई और उपहार देने की परंपरा भी है। चंद्रोदय और पूजा के समय में शहर के अनुसार अंतर हो सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग के अनुसार समय देखना उचित है।

बदलती परंपराओं में साझेदारी का भाव

समय के साथ करवा चौथ मनाने के तरीकों में बदलाव आया है। अब कई परिवारों में पति भी पत्नी के साथ व्रत रखते हैं। इसे आपसी सहयोग और समान भागीदारी की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाता है। कामकाजी महिलाएं अपनी दिनचर्या के बीच त्योहार की तैयारियां करती हैं, जबकि दूर रहने वाले दंपती वीडियो कॉल के जरिए पूजा और चंद्र दर्शन के क्षण साझा करते हैं। तकनीक ने पर्व से जुड़े भावनात्मक जुड़ाव को नई सुविधा दी है।

आस्था के साथ स्वास्थ्य का ध्यान जरूरी

करवा चौथ को लेकर समाज में अलग-अलग दृष्टिकोण हैं। कुछ लोग इसे धार्मिक आस्था और पारिवारिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं, जबकि अन्य वैवाहिक संबंधों में समानता और व्यक्तिगत पसंद को प्राथमिकता देते हैं। किसी भी परंपरा का पालन व्यक्ति की इच्छा, स्वास्थ्य और परिस्थितियों के अनुरूप होना चाहिए। निर्जला व्रत के दौरान पानी नहीं पीने से कमजोरी, चक्कर और निर्जलीकरण की समस्या हो सकती है। स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होने पर व्रत रखने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

करवा चौथ का महत्व केवल उपवास, पूजा और चंद्रमा के दर्शन तक सीमित नहीं है। यह पर्व दांपत्य जीवन में विश्वास, भावनात्मक सहयोग और एक-दूसरे के प्रति सम्मान की अहमियत को भी रेखांकित करता है। परंपराओं का स्वरूप समय के साथ बदल सकता है, लेकिन रिश्तों में संवाद, समझ और साझेदारी की जरूरत हमेशा बनी रहती है। यही भाव इस त्योहार को आज भी अनेक परिवारों के लिए खास बनाता है।

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