शरद पूर्णिमा पर मां लक्ष्मी की कृपा पाने का खास अवसर, जरूर करें श्रीसूक्त का पाठ
मध्यरात्रि पूजा, बिल्व पत्र और कमलगट्टे से जुड़ी हैं समृद्धि की धार्मिक मान्यताएं

शरद पूर्णिमा को मां लक्ष्मी की आराधना के लिए विशेष महत्व दिया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन देवी लक्ष्मी की पूजा और श्रीसूक्त का पाठ करने से सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। ज्योतिषाचार्य पंडित सोमेश परसाई के अनुसार, शरद पूर्णिमा की मध्यरात्रि में मां लक्ष्मी का पूजन करना विशेष फलदायी माना जाता है। इस अवसर पर श्रीसूक्त का पाठ करने के साथ पूजा में कुछ विशेष सामग्री अर्पित करने का भी विधान बताया गया है।
मां लक्ष्मी की पूजा में श्रीसूक्त का महत्व
श्रीसूक्त का पाठ मां लक्ष्मी की आराधना का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसका पाठ धन-समृद्धि की कामना से किया जाता है। यदि पूरा श्रीसूक्त पढ़ना संभव न हो, तो इसके शुरुआती 16 मंत्रों का पाठ करने की सलाह दी जाती है।
पूजा शुरू करने से पहले मां लक्ष्मी को 16 बिल्व पत्र अर्पित करने का भी विधान बताया गया है। श्रीसूक्त के छठे मंत्र में बिल्व वृक्ष और उसके फलों का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा कमलगट्टा अर्पित करना भी लक्ष्मी पूजन की परंपराओं में शामिल है।
सफेद वस्त्र और फूलों से करें पूजन
धार्मिक मान्यता के अनुसार, शरद पूर्णिमा की शाम स्नान करने के बाद सफेद वस्त्र पहनकर मां लक्ष्मी की पूजा की जा सकती है। इस दौरान देवी के चरणों में सफेद और गुलाबी फूल अर्पित करने तथा सफेद रंग की मिठाई का भोग लगाने का विधान बताया गया है।
आर्थिक परेशानी का सामना कर रहे लोगों को प्रत्येक शुक्रवार मां लक्ष्मी की पूजा के बाद श्रीसूक्त का पाठ करने की सलाह भी दी जाती है। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक की गई आराधना से सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
श्रीसूक्त पाठ
ओम हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्। चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह॥
तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्। यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्॥
अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रमोदिनीम्। श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम्॥
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्। पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्॥
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्। तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे॥
आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः। तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः॥
उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह। प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे॥
क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्। अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात्॥
गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्। ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्॥
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि। पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः॥
कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम। श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्॥
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे। नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले॥
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम्। चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह॥
आर्द्रां यःकरिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्। सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह॥
तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्। यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम्॥
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्। सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत्॥



