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उज्जैन से 40 किमी दूर मिले प्राचीन अवशेष, महाकाल वन की सीमाओं के रहस्य से उठ सकता है पर्दा

सामानेरा और टुकराल में शिवलिंग, प्रतिमाएं और मंदिरों के स्थापत्य खंड मिले

लेखक: कपिल माखीजा, जनशक्ति उजालास्थान: उज्जैन, मध्य प्रदेश3 मिनट पढ़ें
प्रतीकात्मक चित्र
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महाकाल वन की प्राचीन सीमाएं कहां तक फैली थीं और इसके प्रवेश द्वार किन क्षेत्रों में रहे होंगे ? उज्जैन से करीब 40 किलोमीटर दूर सामानेरा और टुकराल गांवों में मिले पुरातात्विक अवशेष इन सवालों की पड़ताल के लिए महत्वपूर्ण आधार बन रहे हैं। यहां प्राचीन मिट्टी के बर्तन, टेराकोटा के खिलौने, शिवलिंग, देवी-देवताओं की प्रतिमाएं और मंदिरों के स्थापत्य खंड मिले हैं। ये साक्ष्य क्षेत्र के प्राचीन धार्मिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य इतिहास को समझने में मदद कर सकते हैं।

चार तहसीलों में किया गया विरासत सर्वेक्षण

अवंती-मालवा क्षेत्र विरासत अनुसंधान एवं संरक्षण यात्रा के तहत उज्जैन जिले की तराना, माकड़ौन, उज्जैन और महिदपुर तहसीलों के विभिन्न स्थलों का सर्वेक्षण किया गया। यात्रा के समन्वयक एवं सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के कुलानुशासक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा और अश्विनी शोध संस्थान के निदेशक एवं पुरातत्वविद् डॉ. रामचंद्र ठाकुर के अनुसार, सर्वेक्षण में शैव, शाक्त और वैष्णव परंपराओं से जुड़े महत्वपूर्ण साक्ष्य सामने आए हैं। इनका व्यवस्थित अध्ययन प्राचीन उज्जयिनी और महाकाल वन के भौगोलिक विस्तार को समझने में सहायक हो सकता है।

सामानेरा में मिलीं गुप्तकालीन मानी जाने वाली प्रतिमाएं

छोटी कालीसिंध नदी के किनारे बसे सामानेरा में ब्रह्माणी माता मंदिर की दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती की संयुक्त प्रतिमा विशेष महत्व रखती है। इसे गुप्तकालीन माना जाता है। यहां करीब दो हजार वर्ष पुराना बताया जाने वाला शिवलिंग, टेराकोटा के खिलौने, प्राचीन मृद्भांड तथा गुप्तकाल और परमारकाल की शिव प्रतिमाएं भी मौजूद हैं।

इन अवशेषों से संकेत मिलता है कि सामानेरा अलग-अलग ऐतिहासिक कालखंडों में धार्मिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा हो सकता है। हालांकि, इन स्थलों का महाकाल वन से संबंध और उनकी ऐतिहासिक भूमिका स्पष्ट करने के लिए विस्तृत पुरातात्विक अध्ययन जरूरी है।

टुकराल में प्राचीन मंदिर के अवशेष होने की संभावना

टुकराल के माता खेड़ा यानी नागदेव मंदिर परिसर में बेसाल्ट पत्थरों के बड़े खंड, प्राचीन स्तंभ और बिना गारे के पत्थरों से बनी परकोटे जैसी संरचना मिली है। विशेषज्ञों के अनुसार, वर्तमान मंदिर जिस टीले पर स्थित है, उसके नीचे किसी प्राचीन मंदिर के अवशेष दबे होने की संभावना है। इसकी पुष्टि के लिए वैज्ञानिक जांच और व्यवस्थित पुरातात्विक अध्ययन की आवश्यकता होगी।

मंदिर परिसर में हरिहर, नवदुर्गा, गणेश, नागदेवता और गंगा, यमुना तथा सरस्वती की प्रतिमाएं भी मौजूद हैं। ये प्रतिमाएं क्षेत्र में विभिन्न धार्मिक परंपराओं की उपस्थिति और उनके सह-अस्तित्व को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

सामानेरा और टुकराल में मिले साक्ष्य प्राचीन मालवा की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत पर नए शोध की संभावनाएं खोलते हैं। इनके काल निर्धारण, संरचनाओं के अध्ययन और अन्य पुरातात्विक स्थलों से तुलना के आधार पर ही महाकाल वन के संभावित विस्तार और प्राचीन उज्जयिनी से उसके संबंधों के बारे में अधिक स्पष्ट निष्कर्ष निकाले जा सकेंगे।

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