इंदौर की बांक पंचायत में दो साल से नलों में पानी नहीं, रिकॉर्ड में 100% जलापूर्ति; पीएमओ तक पहुंची शिकायत
जल जीवन मिशन पर करीब सात करोड़ रुपये खर्च करने का दावा, रहवासियों ने प्रमाण-पत्र और पुराने बोरवेल पर उठाए सवाल

इंदौर की बांक पंचायत में नल-जल योजना की जमीनी स्थिति और सरकारी रिकॉर्ड के दावों में अंतर को लेकर सवाल उठे हैं। धार रोड पर सिरपुर तालाब के सामने स्थित इस पंचायत क्षेत्र को सरकारी दस्तावेजों में 100 प्रतिशत नल-जल वाला क्षेत्र बताया गया है। जनवरी 2024 में पंचायत ने प्रमाणित किया था कि हर घर तक नल से साफ पानी पहुंच रहा है। लेकिन रहवासियों का आरोप है कि मार्च 2024 के बाद से कई घरों में नलों से पानी नहीं आया। मामले में प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को शिकायत भेजी गई है।
सात करोड़ रुपये खर्च, फिर भी पानी का इंतजार
जल जीवन मिशन के तहत बांक पंचायत में करीब सात करोड़ रुपये खर्च किए जाने की जानकारी दी गई है। रहवासी व शिकायतकर्ताओं का कहना है कि पंचायत क्षेत्र के 60 प्रतिशत से अधिक घरों में मार्च 2024 के बाद से नल से पानी नहीं पहुंचा। उनके मुताबिक, परीक्षण के दौरान ही नलों में पानी आया था। इसके बाद जलापूर्ति नहीं हुई और पाइपलाइन भी टूट-फूट गई।
शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया कि घरों के बाहर नल के पाइप लगाकर काम पूरा दिखाया गया। खाली प्लॉट पर भी कनेक्शन लगाए गए, जिससे रिकॉर्ड में नल कनेक्शनों की संख्या बढ़ाई जा सके।
पुराने बोरवेल योजना में शामिल करने का आरोप
करीब 40 हजार आबादी वाले बांक पंचायत क्षेत्र में ग्रीन पार्क और नूरानी नगर जैसी कॉलोनियां शामिल हैं। योजना के तहत जवाहर टेकरी पर 10 लाख लीटर क्षमता की पानी की टंकी बनाई गई। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि जल स्रोत के रूप में दर्ज आठ बोरवेल में से तीन-चार दशकों पुराने हैं और इन्हें दोबारा योजना में शामिल किया गया। ये बोरवेल मुख्य टंकी से दो से तीन किलोमीटर दूर बताए गए हैं।
स्थानीय सरपंच सोहराब पटेल और पंचायत सचिव जगदीश मेहता ने 100 प्रतिशत काम पूरा होने और हर घर तक पानी पहुंचने का प्रमाण-पत्र जारी किया था। शिकायतकर्ताओं ने इस प्रमाण-पत्र और भुगतान प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।
सरपंच ने बताई पानी नहीं मिलने की वजह
सरपंच सोहराब पटेल ने कहा कि योजना के तहत नर्मदा की टंकी से पानी मिलने की उम्मीद थी, लेकिन पीएचई ने कनेक्शन देने के बावजूद वहां से पानी नहीं मिला। उन्होंने कहा कि प्रमाण-पत्र पीएचई अधिकारियों के कहने पर जारी किया गया था।
एक शिकायतकर्ता के मुताबिक, शिकायत भेजने के बाद पंचायत सचिव का फोन आया और शिकायत वापस लेने को कहा गया। शिकायतकर्ता ने जवाब दिया कि पानी मिलने पर वे स्वयं शिकायत वापस ले लेंगे।
अब मामला पीएमओ तक पहुंचने के बाद योजना के काम, प्रमाण-पत्र और वास्तविक जलापूर्ति को लेकर उठे सवालों पर कार्रवाई का इंतजार है।



