OBC आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, माता-पिता की सैलरी से तय नहीं होगी क्रीमी लेयर
अदालत ने केंद्र की संशोधन याचिका ठुकराई, सामाजिक स्थिति और पद की प्रकृति को भी माना जरूरी आधार

OBC आरक्षण में क्रीमी लेयर निर्धारित करने के मानदंडों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने केंद्र सरकार की संशोधन याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि किसी उम्मीदवार को आरक्षण के लाभ से वंचित करने का आधार केवल उसके माता-पिता की सैलरी या आय नहीं हो सकती। इस निर्धारण में माता-पिता की सामाजिक स्थिति और उनके पद की प्रकृति जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखना होगा।
PSU और निजी क्षेत्र में कार्यरत अभिभावकों का मामला
यह विवाद उन अभ्यर्थियों से संबंधित है जिनके माता-पिता सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU), बैंकों और निजी संस्थानों में नौकरी करते हैं। ऐसे मामलों में क्रीमी लेयर निर्धारित करने के लिए वेतन को आय में शामिल किए जाने की व्यवस्था पर सवाल उठा था। केंद्र सरकार ने वर्ष 2004 में जारी स्पष्टीकरण के आधार पर वेतन को आय की गणना में शामिल करने की व्यवस्था का समर्थन किया था।
सरकारी आदेश से मूल नीति में बदलाव नहीं
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी सरकारी आदेश या स्पष्टीकरण के माध्यम से मूल नीति में बदलाव नहीं किया जा सकता। अदालत के अनुसार, OBC क्रीमी लेयर का निर्धारण करते समय केवल वेतन के आंकड़ों को आधार बनाना उचित नहीं है। इसके लिए संबंधित अभिभावकों की सामाजिक स्थिति और उनके रोजगार से जुड़े पद की प्रकृति का भी आकलन आवश्यक है।
केंद्र को अनुपालन के लिए आठ सप्ताह की मोहलत
केंद्र सरकार की संशोधन याचिका खारिज करने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले के अनुपालन के लिए अतिरिक्त आठ सप्ताह का समय दिया है। इस निर्णय से OBC आरक्षण के तहत क्रीमी लेयर की पहचान से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है। खासकर सार्वजनिक उपक्रमों, बैंकों और निजी संस्थानों में कार्यरत अभिभावकों के बच्चों की पात्रता तय करने में इस फैसले के सिद्धांत अहम होंगे।



