कोयला उत्पादन में 42% की छलांग, घरेलू खदानों से अक्टूबर में निकला 2.20 करोड़ टन कोयला
कैप्टिव और कमर्शियल खदानों का प्रदर्शन मजबूत, सात महीने में उत्पादन 11.30% बढ़ा; आयात पर निर्भरता घटाने की दिशा में बढ़ते कदम

देश में घरेलू कोयला उत्पादन को बड़ी मजबूती मिली है। कैप्टिव और कमर्शियल कोयला खदानों ने अक्टूबर 2026 में पिछले साल के मुकाबले 42 प्रतिशत अधिक उत्पादन दर्ज किया। कोयला मंत्रालय की ओर से सोमवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, इन खदानों से कुल 2.203 करोड़ टन कोयले का उत्पादन हुआ, जबकि अक्टूबर 2025 में यह मात्रा 1.549 करोड़ टन थी। उत्पादन के साथ कोयले की आपूर्ति में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई।
अक्टूबर के दौरान खदानों से कोयले का डिस्पैच 36 प्रतिशत बढ़कर 2.111 करोड़ टन पहुंच गया। पिछले साल इसी महीने में यह आंकड़ा 1.548 करोड़ टन था। इससे घरेलू स्तर पर कोयले की उपलब्धता और आपूर्ति क्षमता में सुधार के संकेत मिले हैं।
सात महीने में उत्पादन 11.30 प्रतिशत बढ़ा
चालू वित्त वर्ष में अप्रैल से अक्टूबर तक कोयला क्षेत्र ने लगातार बेहतर प्रदर्शन किया। इस अवधि में उत्पादन 10.533 करोड़ टन से बढ़कर 11.723 करोड़ टन हो गया। सालाना आधार पर इसमें 11.30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। वहीं, कोयले का डिस्पैच भी 11.53 प्रतिशत बढ़कर 12.486 करोड़ टन पहुंच गया, जो पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में 11.195 करोड़ टन था।
87 खदानों से हो रहा परिचालन
मंत्रालय के अनुसार, झारखंड की लोहारी कोयला खदान को अक्टूबर 2026 में माइन ओपनिंग की अनुमति मिल गई। यह खदान कई वर्षों से परिचालन शुरू होने की प्रतीक्षा कर रही थी। इस मंजूरी के बाद चालू कैप्टिव और कमर्शियल कोयला खदानों की संख्या बढ़कर 87 हो गई है। मंत्रालय ने इसे कारोबार सुगमता से जुड़े सुधारों का परिणाम बताया है।
कोयला आयात में भी आई कमी
घरेलू उत्पादन बढ़ने का असर आयात के आंकड़ों में भी दिखाई दिया है। अगस्त 2026 में भारत का कोयला आयात सालाना आधार पर 5.83 प्रतिशत घटकर 10.457 करोड़ टन रह गया, जबकि पिछले साल अगस्त में यह 11.105 करोड़ टन था। मंत्रालय के मुताबिक, आयात में 64.8 लाख टन की कमी दर्ज की गई।
मंत्रालय का कहना है कि घरेलू खदानों से बढ़ता उत्पादन विदेशी कोयले पर निर्भरता कम करने, विदेशी मुद्रा बचाने और औद्योगिक क्षेत्रों को नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने में मददगार होगा। उत्पादन क्षमता के बेहतर उपयोग, नीतिगत सुधारों और नियामकीय निगरानी के जरिए इस वृद्धि को आगे भी बनाए रखने पर जोर दिया जा रहा है।



