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‘हम जब भी बंटे, कमजोर हुए’, संघ प्रमुख मोहन भागवत का एकता पर जोर; फ्रांस से नेपाल तक के हालात का किया जिक्र

शताब्दी वर्ष के विजयदशमी उत्सव में स्वदेशी, सामाजिक समरसता और नई पीढ़ी के संस्कारों पर भी बोले

लेखक: कपिल माखीजा, जनशक्ति उजालास्थान: नागपुर4 मिनट पढ़ें
नागपुर में विजयदशमी उत्सव को संबोधित करते संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत।
नागपुर में विजयदशमी उत्सव को संबोधित करते संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत।
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने मंगलवार, 20 अक्टूबर को नागपुर में विजयदशमी उत्सव के अवसर पर देश की एकता, सामाजिक समरसता और स्वदेशी अपनाने पर जोर दिया। संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि भारत विविधताओं वाला देश है, लेकिन सभी को एकजुट होकर आगे बढ़ना होगा। उन्होंने फ्रांस, अल्बानिया, नेपाल और बांग्लादेश के हालात का उल्लेख करते हुए कहा कि केवल सत्ता परिवर्तन से परिस्थितियां नहीं बदलतीं। भागवत ने नशे की समस्या, नई पीढ़ी में सही-गलत की समझ विकसित करने और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत बनाने की जरूरत भी बताई।

‘हम जब भी बंटे, कमजोर हुए’

डॉ. मोहन भागवत ने अपने संबोधन में भारत की विविधता को स्वाभाविक बताते हुए राष्ट्रीय एकता का महत्व रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि देश में अलग-अलग पंथ, प्रांत, जातियां, भाषाएं, खानपान और रीति-रिवाज हैं, लेकिन भारत माता का स्थान सर्वोच्च है। विविधताओं के बावजूद समाज को एकजुट रहकर आगे बढ़ना चाहिए।

उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा विविधता के बीच एकता को स्वीकार करती है। उनके मुताबिक, विविधता परिवर्तनशील है, जबकि संपूर्ण अस्तित्व की एकता का सत्य अटल और शाश्वत है। इसी भावना के आधार पर समाज और राष्ट्र को मजबूत बनाने की आवश्यकता है।

‘सिर्फ सत्ता परिवर्तन से नहीं बदलते हालात’

संघ प्रमुख ने फ्रांस में हो रहे विरोध प्रदर्शनों के साथ अल्बानिया, नेपाल और बांग्लादेश की परिस्थितियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पश्चिम से ऐसी प्रवृत्ति उठ रही है, जो व्यवस्था, संस्कार और शालीनता का विरोध करती है। भागवत के अनुसार, परिस्थितियां बदलने के लिए केवल सत्ता परिवर्तन को समाधान मानना उचित नहीं है।

उन्होंने आंदोलनों के उद्देश्यों पर भी बात की। भागवत ने कहा कि यदि किसी आंदोलन के पीछे समाज के प्रति अपनत्व की भावना है, तो वह सकारात्मक हो सकता है। लेकिन जब आंदोलन किसी व्यक्ति, समूह या विचार के प्रति विरोध बढ़ाने का माध्यम बन जाता है, तो उसका इस्तेमाल राजनीतिक उद्देश्यों के लिए होने लगता है।

*स्वदेशी और सांस्कृतिक पहचान पर जोर

संघ के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर भागवत ने संगठन की भूमिका और उसके उद्देश्यों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि संघ पिछले सौ वर्षों से भारत की अपनी पहचान, संस्कृति और परंपराओं के आधार पर देश को संगठित एवं मजबूत बनाने का काम कर रहा है। उन्होंने स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने और अपनी सांस्कृतिक पहचान के प्रति जागरूकता बढ़ाने की जरूरत बताई।

इस संदर्भ में उन्होंने बंगाल के राजनारायण बसु का जिक्र किया। भागवत ने कहा कि स्वदेशी मेलों के माध्यम से लोगों को अपनी संस्कृति और पहचान के प्रति जागरूक करने के लिए बसु ने हिंदू मेले की शुरुआत की थी। उन्होंने संत रविदास के योगदान को भी याद किया और कहा कि विदेशी आक्रमणों तथा अत्याचारों के दौर में संत रविदास ने स्वधर्म के प्रति निष्ठा, सामाजिक समरसता और भक्ति का संदेश दिया।

नई पीढ़ी को नशे और गलत प्रवृत्तियों से बचाने की बात

डॉ. मोहन भागवत ने युवाओं में नशीले पदार्थों की बढ़ती लत को गंभीर समस्या बताया। उन्होंने अभिभावकों से नई पीढ़ी को नशे के दुष्परिणामों के प्रति जागरूक करने और सही दिशा देने पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी नई चीजों को जानने और सीखने के लिए उत्सुक रहती है, लेकिन उसके भीतर सही और गलत के बीच अंतर समझने की क्षमता विकसित करना जरूरी है। डिजिटल माध्यमों और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दिखाई जाने वाली सामग्री के संदर्भ में भी उन्होंने नियम, अनुशासन और समझदारी की आवश्यकता का उल्लेख किया।

शताब्दी वर्ष में विजयदशमी उत्सव

संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर नागपुर में आयोजित विजयदशमी कार्यक्रम में शस्त्र पूजन भी किया गया। इससे पहले डॉ. मोहन भागवत ने संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के स्मृति मंदिर में उनकी प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की। आरएसएस की स्थापना वर्ष 1925 में विजयदशमी के दिन नागपुर में हुई थी। संघ की स्थापना के बाद से विजयदशमी उत्सव उसकी प्रमुख परंपराओं में शामिल रहा है। इस अवसर पर देशभर में पथ संचलन के कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।

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