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बदलती दुनिया में पुरानी पड़ रही सुरक्षा परिषद की संरचना, भारत की दावेदारी क्यों अहम

वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव के बीच विकासशील देशों के प्रतिनिधित्व और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी का सवाल

लेखक: कपिल माखीजा, जनशक्ति उजालास्थान: नई दिल्ली4 मिनट पढ़ें
संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय
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दुनिया की राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से जुड़े बड़े फैसले लेने वाली संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना अब भी पुराने वैश्विक शक्ति संतुलन पर आधारित है। ऐसे में परिषद में सुधार और भारत को स्थायी सदस्यता देने की मांग वैश्विक प्रतिनिधित्व, समान भागीदारी और बहुपक्षीय व्यवस्था की प्रभावशीलता से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बन गई है। भारत का पक्ष है कि बदलती दुनिया की वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा परिषद का स्वरूप अधिक समावेशी बनाया जाना चाहिए, ताकि विकासशील देशों को भी निर्णय प्रक्रिया में उचित स्थान मिल सके।

1945 की व्यवस्था और आज की चुनौतियां

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पांच स्थायी सदस्य अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन हैं, जबकि दस अस्थायी सदस्य दो वर्ष के कार्यकाल के लिए चुने जाते हैं। स्थायी सदस्यों को वीटो का विशेष अधिकार प्राप्त है। वर्तमान व्यवस्था उस दौर की शक्ति संरचना को दर्शाती है, जब संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई थी। इसके बाद दुनिया की आर्थिक ताकत, राजनीतिक समीकरण और अंतरराष्ट्रीय चुनौतियां काफी बदल चुकी हैं। एशिया और अफ्रीका की बढ़ती भूमिका के बावजूद परिषद में इन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व सीमित बना हुआ है।

भारत की दावेदारी का व्यापक आधार

भारत की स्थायी सदस्यता की मांग केवल उसकी राष्ट्रीय आकांक्षा तक सीमित नहीं है। दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाले देश और प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में भारत अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाता है। संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में भारतीय सैनिकों का योगदान भी उसकी प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है। भारत का मानना है कि वैश्विक शांति और सुरक्षा से जुड़े फैसलों में उसकी भागीदारी बढ़ने से विकासशील देशों तथा ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं को अधिक प्रभावी ढंग से सामने रखा जा सकेगा।

वीटो और प्रतिनिधित्व पर मतभेद

सुरक्षा परिषद में सुधार का विषय केवल सदस्यों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसमें स्थायी और अस्थायी सदस्यता का विस्तार, वीटो अधिकार तथा निर्णय लेने की प्रक्रिया में बदलाव जैसे सवाल भी शामिल हैं। भारत नए स्थायी सदस्यों को समान अधिकार दिए जाने की वकालत करता है। हालांकि, वीटो के भविष्य और परिषद के नए स्वरूप को लेकर सदस्य देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं। भारत का जोर है कि सुधार से जुड़ी सभी प्रमुख बातों पर एक साथ चर्चा होनी चाहिए।

जी-4 के जरिए बढ़ रही पहल

भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान के समूह जी-4 ने सुरक्षा परिषद में स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों में विस्तार की मांग उठाई है। समूह अफ्रीका सहित उन क्षेत्रों को भी उचित प्रतिनिधित्व देने पर जोर देता है, जिनकी आवाज मौजूदा स्थायी सदस्यता व्यवस्था में सीमित है। सदस्य देशों के अलग-अलग हित और नए सदस्यों के अधिकारों पर असहमति के कारण इस दिशा में सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। अक्टूबर 2026 में भी जी-4 ने वास्तविक बातचीत और साझा प्रस्ताव की जरूरत पर जोर दिया है।

सुधार के रास्ते में कानूनी और राजनीतिक बाधाएं

सुरक्षा परिषद की संरचना में बदलाव के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन करना होगा। इसके लिए व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन के साथ सभी पांच स्थायी सदस्यों सहित आवश्यक सदस्य देशों की पुष्टि जरूरी है। राष्ट्रीय हित, आपसी प्रतिस्पर्धा और सुधार के अलग-अलग प्रस्ताव इस प्रक्रिया को जटिल बनाते हैं। कुछ देश स्थायी सदस्यता के विस्तार के पक्ष में हैं, जबकि अन्य अस्थायी सीटें बढ़ाने को प्राथमिकता देते हैं। ऐसे में केवल समर्थन जताने के बजाय लिखित प्रस्तावों, ठोस बातचीत और समयबद्ध प्रयासों से आगे बढ़ना आवश्यक है।

वैश्विक व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा मुद्दा

सुरक्षा परिषद में व्यापक प्रतिनिधित्व से जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, क्षेत्रीय संघर्षों और मानवीय संकटों जैसी चुनौतियों पर चर्चा में विभिन्न क्षेत्रों के अनुभव शामिल हो सकते हैं। हालांकि, अधिक सदस्य जोड़ना ही पर्याप्त नहीं होगा। परिषद की पारदर्शिता, जवाबदेही और निर्णय लेने की क्षमता को भी मजबूत करना होगा।

बदलती वैश्विक परिस्थितियों में सुरक्षा परिषद में सुधार की आवश्यकता लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। भारत की स्थायी सदस्यता की मांग इसी व्यापक बहस का हिस्सा है। यदि संयुक्त राष्ट्र को मौजूदा दौर की चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटना है, तो उसकी निर्णय प्रक्रिया में दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों और विकासशील देशों की भागीदारी बढ़ाने पर ठोस सहमति बनानी होगी। ऐसी पहल वैश्विक सहयोग को मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की विश्वसनीयता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।

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