सुप्रीम कोर्ट की दोटूक : हिरासत में लेने के 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना जरूरी
औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज करने में देरी से नहीं बदलेगी समय-सीमा, पुलिस हिरासत का वास्तविक समय होगा आधार

किसी व्यक्ति को पुलिस हिरासत में लेने के बाद उसकी औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज करने में देरी करके कानूनी समय-सीमा से बचा नहीं जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है। इस अवधि की गणना गिरफ्तारी की औपचारिक प्रक्रिया शुरू होने से नहीं, बल्कि व्यक्ति को वास्तव में हिरासत में लेने के समय से की जाएगी।
हिरासत और गिरफ्तारी के समय में अंतर नहीं चलेगा
अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच एजेंसियां किसी व्यक्ति को पहले अपने नियंत्रण में रखकर बाद में उसकी गिरफ्तारी दर्ज करने का तरीका नहीं अपना सकतीं। हिरासत का वास्तविक समय ही 24 घंटे की संवैधानिक समय-सीमा तय करने का आधार होगा। इसका उद्देश्य गिरफ्तारी की प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखना और व्यक्ति के कानूनी अधिकारों को सुरक्षित करना है।
त्रिपुरा के चार लोगों से जुड़ा था मामला
यह मामला त्रिपुरा के चार लोगों की याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। इन्हें 29 सितंबर 2025 को तलाशी और जब्ती की कार्रवाई के दौरान हिरासत में लिया गया था, जबकि उनकी औपचारिक गिरफ्तारी अगले दिन दर्ज की गई। दोनों प्रक्रियाओं के बीच करीब 21 घंटे का अंतर था। इसी घटनाक्रम ने हिरासत और गिरफ्तारी के वास्तविक समय को लेकर कानूनी सवाल खड़े किए।
मौलिक अधिकारों की सुरक्षा पर जोर
संविधान के अनुच्छेद 22 के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारण जानने और अपनी पसंद के वकील से कानूनी सहायता लेने का अधिकार प्राप्त है। ऐसे प्रावधान पुलिस कार्रवाई पर संवैधानिक निगरानी और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं।
महिलाओं की गिरफ्तारी के संबंध में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में भी विशेष नियम निर्धारित किए गए हैं। इनका उद्देश्य गिरफ्तारी की प्रक्रिया को कानून के दायरे में रखना है। सुप्रीम कोर्ट की यह स्पष्टता जांच एजेंसियों के लिए हिरासत का समय और गिरफ्तारी का रिकॉर्ड सही तरीके से दर्ज करने की जिम्मेदारी को रेखांकित करती है।



