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बयानवीरों का नया रंगमंच: जब 'विरोध' ही बन जाए पूर्णकालिक पेशा सड़कों पर काम की रफ्तार और बंद कमरों में केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस की गूंज

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इंदौरसंपादक 12 मिनट पढ़ें
बयानवीरों का नया रंगमंच: जब 'विरोध' ही बन जाए पूर्णकालिक पेशा सड़कों पर काम की रफ्तार और बंद कमरों में केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस की गूंज

राजनीति में कुछ दल चुनाव जीतने के लिए मेहनत करते हैं, कुछ नीतियां बनाने के लिए पसीना बहाते हैं, और फिर आती है सीजेपी जैसी पार्टियां—जिनका सारा पसीना सिर्फ माइक के सामने और टीवी कैमरों की चकाचौंध में बहता है। सुबह की चाय के साथ इनका पहला काम देश के विकास का नक्शा देखना नहीं, बल्कि यह खोजना होता है कि आज किस नए बने पुल, सड़क या डिजिटल सुधार में खोट निकाली जाए। ​इनका सीधा सा गणित है: अगर देश में कोई व्यवस्था दशकों की सुस्ती तोड़कर तेजी से दौड़ने लगे, तो उसमें किसी भी तरह अड़ंगा लगा दो। जब देश के कोने-कोने में विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचे की ईंटें रखी जा रही हैं, बंदरगाहों से लेकर एक्सप्रेसवे तक की रफ्तार बढ़ रही है, तब सीजेपी के रणनीतिकार बंद कमरों में बैठकर इस बात पर सिर खपा रहे होते हैं कि 'विकास' शब्द का विरोध किन नए मुहावरों में किया जाए। इनके पास अर्थव्यवस्था को चलाने का कोई रोडमैप नहीं है, लेकिन हर ठोस नीति पर सवाल उठाने की एक लंबी, रटी-रटाई फेहरिस्त जरूर है। ​हैरानी की बात यह है कि जब भी प्रशासनिक स्तर पर कड़े और दूरगामी फैसले लिए जाते हैं, तो सीजेपी को उसमें सिर्फ ‘संकट’ नजर आता है। असल में संकट व्यवस्था में नहीं, बल्कि उन सियासी दुकानों में है जो सिर्फ अराजकता और लोकलुभावन वादों के खोखले नारों पर चलती आई हैं। जनता को मुफ्त के हवाई सपने दिखाना बहुत आसान है, लेकिन धरातल पर बजट का संतुलन बनाकर कल्याणकारी योजनाएं घर-घर पहुंचाना एक परिपक्व और स्थिर सोच की मांग करता है। ​सत्ता चलाना और राष्ट्र निर्माण करना कोई तीन मिनट का रील्स वीडियो या सोशल मीडिया का हैशटैग अभियान नहीं है। इसके लिए दृष्टि, अनुशासन और दृढ़ इच्छाशक्ति चाहिए। सीजेपी को शायद यह बात समझ नहीं आ रही कि जनता अब भाषणों के जादू और जमीनी हकीकत का फर्क बखूबी जानती है। जो लोग दिन-रात सिर्फ कमियां तलाशने का रोजगार कर रहे हैं, उन्हें यह याद रखना चाहिए कि देश आगे बढ़ने के लिए तैयार खड़ा है—चाहे कोई पूरे दिन माइक पर चिल्लाता ही क्यों न रहे।

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